कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि क्यों नहीं
रह पायी कभी कोई भी सभ्यता इस
धरती पर चिरकाल तक …
क्यों हर सभ्यता अपनी चरम सीमा
पर आने के बाद मिट गयी,
और रह गये केवल उनके अवशेष।
इस धरती ने बार-बार हमें अपनी
गोद में जगह दी,
नदियाँ दीं, पहाड़ दिये, जंगल
दिये,
शुद्ध हवा दी, अनाज दिये ..
अपनी देह को चीरकर उसके विकास के लिए
खनिज संपदाएँ दीं।
जब सभ्यताएँ अपनी चरम सीमा पर
पहुँच गयीं, वे स्वयं को सर्वशक्तिशाली
समझने लगीं।
उन्होंने भुला दिया
धरती के प्रेम को,
उसके किये गये हर उपकार को …
अनादर किया उसके दिये गये हर उपहार का…
धरती ने बार-बार भरोसा किया,
पर हर सभ्यता ने वही छल
दुहराया …
इसीलिए धरती को
उजाड़नी पड़ी अपनी ही कोख हर बार।
कितना पीड़ादायी होता होगा,
अपनी ही कोख को बार-बार उजाड़ना…
लेकिन यह पीड़ा हमारे दिये गये विश्वासघात
से कम थी…
तभी तो
नहीं बच पायी कोई भी सभ्यता
आज तक…
इस धरती से विदा लेने से पहले
मैं आने वाली पीढ़ियों से बस
इतना ही अनुरोध करना चाहूँगी
कि भले ही मत नापना तुम
समुद्र की गहराई, भले ही मत बनाना तुम
आकाश को छूती हुई इमारतें,
भले ही मत बसाना चाँद पर
घर…
मगर इस धरती के किये गये उपकार
के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना,
उसके दिये गये हर उपहार को सँवारना।
धरती को एक और बार चोट
पहुँचने से पहले तुम बचा लेना।
मेरे बच्चों, इस बार तुम धरती
का भरोसा मत तोड़ना…
लेखिका -शिल्पा शुक्ला
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